Aravali Sanrakshan और PLPA 1900 का पूरा सच: क्या है अरावली की कानूनी जंग और अस्तित्व की लड़ाई?


अरावली पर्वतमाला को अगर सिर्फ पत्थरों और चट्टानों की एक श्रृंखला समझा जाए, तो यह सबसे बड़ी भूल होगी। यह पर्वतमाला उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। लगभग 692 किलोमीटर लंबी यह श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जिसकी उम्र करोड़ों वर्षों में मापी जाती है।

अरावली का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह थार रेगिस्तान की रेतीली आंधियों को गंगा के मैदानी इलाकों तक पहुंचने से रोकती है। यदि अरावली न हो, तो पश्चिमी भारत का मरुस्थलीकरण धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले सकता है।
इसके अलावा, दिल्ली–NCR और हरियाणा क्षेत्र में भूजल (Groundwater) का प्राकृतिक रिचार्ज बड़े पैमाने पर अरावली की पहाड़ियों और जंगलों पर निर्भर करता है। बारिश का पानी इन्हीं पहाड़ियों के जरिए जमीन में जाता है और कुओं, बोरवेल और जलाशयों को जीवन देता है।

लेकिन विडंबना यह है कि जिस अरावली ने सदियों तक मानव सभ्यता को सहारा दिया, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
पिछले लगभग 30–40 वर्षों में अवैध खनन, बिल्डर लॉबी, माफिया राज और अनियोजित शहरीकरण ने अरावली को बुरी तरह घायल किया है। पहाड़ काटे गए, जंगल साफ किए गए और प्राकृतिक जलस्रोतों को कंक्रीट में बदल दिया गया।

अरावली के संरक्षण से जुड़ी कानूनी लड़ाई का केंद्र बिंदु है पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट (PLPA), 1900। यह कानून ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था और आज भी हरियाणा राज्य के कई हिस्सों में लागू है।

इस कानून का मूल उद्देश्य था —
👉 मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोकना,
👉 वनस्पति को बचाना,
👉 और पानी के प्राकृतिक प्रवाह को संरक्षित रखना

PLPA के तहत सरकार को यह अधिकार दिया गया कि वह कुछ क्षेत्रों को “संरक्षित” घोषित कर सके, जहां पर:

  • पेड़ों की कटाई
  • खनन गतिविधियां
  • या भूमि उपयोग में बड़े बदलाव पर प्रतिबंध लगाया जा सके।

दशकों से हरियाणा सरकार, बिल्डर और रियल एस्टेट लॉबी यह दलील देती रही है कि PLPA केवल “मिट्टी संरक्षण” के लिए है, न कि “जंगल” (forest) संरक्षण के लिए। उनका कहना था कि PLPA क्षेत्र “वन भूमि” (forest land) नहीं माने जाते, इसलिए वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act) यहां लागू नहीं होता। इस भ्रम के आधार पर:

  • हजारों अवैध निर्माण हुए (फार्महाउस, रिसॉर्ट, टाउनशिप)।
  • अवैध खनन (स्टोन, सैंड, बजरी) जारी रहा।
  • भूमि को “नॉन-फॉरेस्ट” बताकर कन्वर्ट किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को बार-बार तोड़ा है और PLPA नोटिफाइड क्षेत्रों को “वन” (forest) माना है। प्रमुख फैसले

2002-2004 (MC Mehta मामले में): 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली हिल्स (हरियाणा और राजस्थान) में सभी खनन गतिविधियों पर बैन लगा दिया। 6 मई 2002 को दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर से 5 किमी तक और अरावली में खनन और ग्राउंडवाटर पंपिंग रोक दी।

PLPA कनेक्शन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PLPA की धारा 4 और 5 के तहत नोटिफाइड क्षेत्रों को “वन” माना जाएगा। 18 मार्च 2004 के फैसले में कहा कि अरावली की इकोलॉजी में अपरिवर्तनीय (irreversible) क्षति हो रही है, इसलिए सस्टेनेबल डेवलपमेंट के आधार पर ही खनन की अनुमति, और वो भी सख्त शर्तों के साथ।

प्रभाव: सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (CEC) ने अवैध खनन की रिपोर्ट दी, जिसके आधार पर सख्त आदेश आए। अरावली को “प्राकृतिक बैरियर” बताया जो थार रेगिस्तान को फैलने से रोकता है। ये फैसला PLPA नोटिफाइड भूमि को forest मानने की शुरुआत था।

2009 (Vijay Bansal और अन्य): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PLPA की धारा 4 के तहत नोटिफाइड भूमि “वन” है। ये भूमि “forest land” मानी जाती है, और इन पर नॉन-फॉरेस्ट यूज (जैसे निर्माण या खेती का ब्रेकअप) नहीं हो सकता बिना FC Act 1980 की अनुमति के।

PLPA कनेक्शन: कोर्ट ने कहा कि PLPA धारा 3, 4 या 5 के तहत नोटिफाइड लैंड्स forest lands हैं, और इन्हें MC Mehta (2004) के फैसले के तहत प्रोटेक्ट किया जाएगा। हरियाणा में कई इलाकों (जैसे फरीदाबाद) में ये लागू हुआ।

प्रभाव: ये फैसला PLPA नोटिफाइड एरिया को forest मानने को मजबूत करता है, और राज्य सरकार को सख्ती से लागू करने का निर्देश।

2018 (Kant Enclave मामला – MC Mehta में): सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हरियाणा में PLPA के तहत नोटिफाइड भूमि को “वन” और “वन भूमि” माना जाएगा। फरीदाबाद के Kant Enclave जैसे अवैध कॉलोनी को ध्वस्त करने का आदेश दिया, क्योंकि 1992 के बाद बने निर्माण अवैध थे। कोर्ट ने कहा कि अरावली में क्षति “अप्रत्यावर्तनीय” (irreversible) है।

2022 (Narinder Singh और अन्य): कोर्ट ने दोहराया कि PLPA धारा 4 के क्षेत्र “वन” हैं और Forest Conservation Act, 1980 लागू होता है। हरियाणा की लगभग 7.1% भूमि को वन माना गया।

इन फैसलों से PLPA क्षेत्रों पर खनन, निर्माण और गैर-वन गतिविधियाँ प्रतिबंधित हो गईं। लेकिन राज्य सरकारें अक्सर इन आदेशों की अनदेखी करती रहीं—2021 में हरियाणा ने PLPA में संशोधन की कोशिश की ताकि शहरी क्षेत्रों को बाहर किया जाए और 30,000 हेक्टेयर (74,000 एकड़) PLPA वन भूमि को रियल एस्टेट/खनन के लिए खोल दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ऐसे संशोधनों पर स्टे लगाया।

हाल के वर्षों में विवाद नई परिभाषा पर केंद्रित है: सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली की परिभाषा को मंजूरी दी (100 मीटर से ऊंची पहाड़ियाँ), लेकिन पर्यावरणविदों ने इसे कमजोर करने वाला बताया। दिसंबर 2025 में कोर्ट ने अपने ही फैसले पर स्टे लगा दिया और नई एक्सपर्ट कमिटी गठित की। खनन पर रोक बरकरार है, लेकिन अवैध गतिविधियाँ जारी हैं।

यह कानूनी जंग PLPA की व्याख्या से शुरू हुई और आज भी जारी है—एक तरफ संरक्षण की लड़ाई, दूसरी तरफ विकास और मुनाफे की।

अरावली संरक्षण की कानूनी लड़ाई पिछले तीन दशकों से सुप्रीम कोर्ट में चल रही है, जहां कोर्ट ने बार-बार पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी है। हरियाणा सरकार ने PLPA (Punjab Land Preservation Act, 1900) में संशोधन की कई कोशिशें कीं ताकि PLPA अधिसूचित भूमि को “वन” की श्रेणी से बाहर कर निर्माण, रियल एस्टेट और खनन के लिए खोल दिया जाए।

2018 (MC Mehta मामले में, Kant Enclave): सुप्रीम कोर्ट ने फरीदाबाद के Kant Enclave जैसे अवैध कॉलोनियों पर सख्त फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि PLPA धारा 4 के तहत नोटिफाइड भूमि “वन” है। 18 अगस्त 1992 के बाद बने सभी निर्माण अवैध हैं और उन्हें ध्वस्त किया जाए। कोर्ट ने “अप्रत्यावर्तनीय क्षति” (irreversible damage) की बात कही और राज्य सरकार को फटकार लगाई।

2022 (जुलाई में MC Mehta और संबंधित मामलों में): कोर्ट ने दोहराया कि PLPA धारा 4 की सभी अधिसूचित भूमि “वन” मानी जाएगी। राज्य सरकार बिना केंद्र की मंजूरी के इन भूमियों को गैर-वन उपयोग के लिए नहीं बदल सकती। कोर्ट ने अवैध संरचनाओं को हटाने और स्थिति को पूर्ववत (status quo ante) करने का आदेश दिया। हरियाणा में 2019 के PLPA संशोधन (जिससे हजारों हेक्टेयर भूमि को बाहर करने की कोशिश की गई) पर स्टे लगा रहा और इसे लागू नहीं होने दिया।

पर्यावरण वकील एम.सी. मेहता की याचिका (1985 से) अरावली संरक्षण का मुख्य आधार बनी। कोर्ट ने माना कि अरावली का पारिस्थितिकी तंत्र दिल्ली-NCR के लिए जीवन रेखा है—भूजल रिचार्ज, थार की धूल रोकना, जैव विविधता। 2002 में कोर्ट ने हरियाणा और राजस्थान में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। 2018-2022 के फैसलों में कोर्ट ने कहा कि अवैध खनन और निर्माण से “अप्रत्यावर्तनीय” नुकसान हो रहा है। कोर्ट ने सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (CEC) की रिपोर्ट्स पर आधारित आदेश दिए, जिसमें अवैध गतिविधियों को रोकने और बहाली पर जोर दिया गया।

एक कड़वा लेकिन जरूरी फैसला 2021 में फरीदाबाद के सूरजकुंड इलाके में खोरी गाँव (Khori Gaon) सबसे विवादास्पद मामला रहा। यहां अरावली की PLPA भूमि पर करीब 10,000 झुग्गी-झोपड़ियां और घर बने थे, जहां लगभग 60,000 लोग रहते थे।

अधिवक्ताओं/निवासियों की दलील: ये गरीब लोग दशकों से यहां बसे हैं, उनके पास आधार, वोटर आईडी आदि हैं। उन्हें हटाना मानवाधिकार उल्लंघन और “राइट टू हाउसिंग” के खिलाफ है। पुनर्वास (rehabilitation) की मांग की गई।

कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि “वन भूमि पर कोई समझौता नहीं होगा” और “राइट टू हाउसिंग” जंगल पर कब्जा करने का लाइसेंस नहीं देता। PLPA/वन भूमि पर अवैध कब्जे को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। अंततः, 2021 में भारी विरोध और प्रदर्शनों के बीच इन घरों को ध्वस्त कर दिया गया। यह फैसला दिखाता है कि कोर्ट अब अरावली संरक्षण को लेकर कितना गंभीर है, भले ही मानवीय लागत ज्यादा हो।

एडवोकेट आनंद आर्य (प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता): “अगर अरावली का सीना इसी तरह माइनिंग से छलनी होता रहा, तो पहाड़ियों में जो प्राकृतिक वाटर चैनल हैं, वे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। गुड़गांव-दिल्ली प्यासे मर जाएंगे, क्योंकि भूजल रिचार्ज रुक जाएगा।

सरकारी/बिल्डरों का पक्ष: संसद/विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार है। PLPA में बदलाव विकास के लिए जरूरी है—निवेश बचाना, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर।

कोर्ट की टिप्पणी (विभिन्न सुनवाइयों में): “आप (सरकार) दिल्ली को रेगिस्तान बनाना चाहते हैं? अगर आप अरावली नहीं बचा सकते, तो हम आपको प्रशासन चलाने का अधिकार कैसे दे सकते हैं?” कोर्ट ने राज्य को “साइलेंट स्पेक्टेटर” कहा जब अवैध कब्जे होते रहे।

100 मीटर से ऊंची लैंडफॉर्म्स को अरावली माना, लेकिन पर्यावरणविदों ने इसे कमजोर बताया (कई क्षेत्र बाहर हो सकते हैं)। खनन पर मोरेटोरियम और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान (MPSM) का आदेश दिया। लेकिन 29 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने अपने ही फैसले पर स्टे लगा दिया और हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी गठित की। जनवरी 2026 में सुनवाई में स्टे जारी रखा गया, कमिटी से नाम मांगे गए। यह लड़ाई जारी है—संरक्षण vs विकास।

अरावली पर्वतमाला राजस्थान और हरियाणा के बीच थार रेगिस्तान की रेत को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। लेकिन “गुलाबी पत्थर” (pink sandstone), बजरी, ग्रेनाइट और अन्य खनिजों के लालच में खनन माफिया ने दशकों से इसे छलनी कर दिया है। अवैध खनन (illegal mining) ने न सिर्फ पहाड़ियों को समतल कर दिया, बल्कि भूजल स्तर गिराया, जैव विविधता नष्ट की और दिल्ली-NCR में धूल-प्रदूषण बढ़ाया है।

गायब होती पहाड़ियां: चौंकाने वाले आंकड़े
2018 में सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (CEC) और फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की रिपोर्ट ने सबको हिला दिया। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में अध्ययन किए गए 128 पहाड़ियों में से 31 पूरी तरह गायब हो चुकी हैं—अवैध खनन के कारण 50 वर्षों में ये पहाड़ियां मिट गईं, उनकी जगह गहरे गड्ढे या समतल जमीन बनी। कोर्ट ने राजस्थान सरकार को फटकार लगाई: “31 पहाड़ियां गायब? अगर पहाड़ गायब होते रहे तो क्या होगा? लोग हनुमान बन गए हैं क्या?”

यह नुकसान सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं—हरियाणा के कई जिलों (जैसे छरखी दादरी, भिवानी) में भी बड़े पैमाने पर पहाड़ियां नष्ट हुईं। 1975 से 2019 तक अरावली के 8% हिस्से गायब हुए, और अनुमान है कि 2059 तक यह 22% तक पहुंच सकता है। अवैध खनन ने 10-12 बड़े गैप (breaches) खोल दिए, जिससे थार की धूल सीधे दिल्ली-NCR पहुंच रही है, AQI बढ़ रहा है और प्रदूषण नियंत्रण मुश्किल हो गया है।

पर्यावरणविदों और अधिवक्ताओं की चिंता
कोर्ट में पर्यावरण वकीलों ने दलील दी कि पहाड़ियों के गायब होने से हवा का प्राकृतिक रुख बदल रहा है। अरावली थार की लू और धूल को रोकती थी—अब ये बाधा कमजोर होने से दिल्ली में सैंडस्टॉर्म बढ़े हैं, भूजल रिचार्ज रुक रहा है और कृषि-जल संकट गहरा रहा है।

लेपर्ड कॉरिडोर और इकोसिस्टम पर असर
अरावली सिर्फ पत्थर नहीं—यह तेंदुओं (Indian leopards), लकड़बग्घों (striped hyenas), गोल्डन जैकल, जंगली बिल्लियों, नीलगाय और 200+ पक्षी प्रजातियों का घर है। यह वन्यजीव कॉरिडोर (wildlife corridors) है जो सरिस्का, मुकुंदरा और अन्य संरक्षित क्षेत्रों को जोड़ता है।

  • विवाद: सरकारों ने पहाड़ों के बीच हाईवे, रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रस्तावित किए, जिससे माइग्रेशन रूट बाधित हो रहे हैं।
  • खनन का प्रभाव: ब्लास्टिंग, धूल और गड्ढों से आवास खंडित हो रहा है। तेंदुए अब बंधवाड़ी, सोहना रोड (गुड़गांव) जैसे आबादी वाले इलाकों में आ रहे हैं—मानव-वन्यजीव संघर्ष (human-wildlife conflict) बढ़ा है, जो दोनों के लिए जानलेवा है। औषधीय पौधे पहले गायब हो रहे हैं, फिर जानवर।
  • नवंबर 2025 में कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा (100 मीटर ऊंचाई) मंजूर की, लेकिन नए माइनिंग लीज पर रोक लगाई और “Mine Plan for Sustainable Mining” (MPSM) बनाने का आदेश दिया।
  • लेकिन पर्यावरणविदों के विरोध के बाद दिसंबर 2025 में कोर्ट ने अपने फैसले पर स्टे लगा दिया। जनवरी 2026 में सुनवाई में कोर्ट ने कहा: “अवैध खनन से अपरिवर्तनीय क्षति हो रही है।” राजस्थान सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई अनधिकृत खनन नहीं होगा।
  • कोर्ट ने हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी गठित करने का फैसला किया—पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों की सलाह मांगी गई।

खनन माफिया अभी भी सक्रिय है—राजस्थान में 2020-2023 में 28,000+ अवैध केस दर्ज, जिनमें 56% अरावली जिलों में। 2025 में भी छिटपुट अवैध गतिविधियां जारी हैं।

यह लड़ाई सिर्फ कानूनी नहीं—अरावली बचाना उत्तर भारत के पर्यावरण, जल और वन्यजीवों की रक्षा है।

अरावली की बहाली अब सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं रही—यह सक्रिय एक्शन का दौर है। केंद्र सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट (Aravalli Green Wall Project) लॉन्च किया, जो थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकने और दिल्ली-NCR को प्राकृतिक ढाल देने का बड़ा प्रयास है।

  • 2025 के अपडेट: MoEF&CC ने डिटेल्ड एक्शन प्लान लॉन्च किया—36,025 हेक्टेयर भूमि बहाल की गई और 393.24 लाख (लगभग 3.93 करोड़) पौधे लगाए गए। यह प्रोजेक्ट दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के 29 जिलों में 1,400 किमी लंबा और 5 किमी चौड़ा ग्रीन बफर जोन बनाएगा। लक्ष्य: 2027 तक 1.15 मिलियन हेक्टेयर बहाल करना।
  • मुख्य फोकस: मूल प्रजातियों (native species) के पौधे लगाना, 75 जलाशयों का पुनरुद्धार, मिट्टी संरक्षण, वाटर हार्वेस्टिंग और कार्बन सेक्वेस्ट्रेशन।
  • कम्युनिटी इन्वॉल्वमेंट: स्थानीय समुदायों को शामिल कर रोजगार सृजन—एग्रो-फॉरेस्ट्री, इको-टूरिज्म और नर्सरी विकास। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ कैंपेन से जुड़ा यह प्रोजेक्ट युवाओं और ग्रामीणों को जोड़ रहा है।
  • Sankala Foundation: हरियाणा के गांवों (Gairatpur Bas, Naurangpur आदि) में इंटीग्रेटेड इको-रेस्टोरेशन रिपोर्ट तैयार की—जंगल, कृषि भूमि, स्क्रब, जलाशय और बस्तियों को एक यूनिट मानकर बहाली। कम्युनिटी-लेड कंजर्वेशन पर जोर।
  • अन्य प्रयास: स्थानीय संगठन और NGO माइक्रो-प्लानिंग, स्वच्छता अभियान और वाटर बॉडी रिवाइवल कर रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे प्लेटफॉर्म पर पॉलिसीमेकर्स, वैज्ञानिक और लोकल स्टेकहोल्डर्स मिलकर रणनीति बना रहे हैं।

कोर्ट की निगरानी और सस्टेनेबल माइनिंग
सुप्रीम कोर्ट ने बहाली को मजबूत बनाने के लिए निर्देश दिए:

  • नवंबर 2025 के फैसले में “Mine Plan for Sustainable Mining” (MPSM) का आदेश—पोस्ट-माइनिंग रेस्टोरेशन, मॉनिटरिंग और इकोलॉजिकल असेसमेंट अनिवार्य।
  • लेकिन पर्यावरणविदों के विरोध पर दिसंबर 2025 में स्टे लगा दिया गया।
  • 21 जनवरी 2026 (आज की सुनवाई): CJI सूर्या कांत की बेंच ने स्टे बढ़ाया, स्टेटस क्वो बनाए रखने का आदेश। राजस्थान सरकार ने अवैध खनन रोकने का आश्वासन दिया। कोर्ट ने हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी गठित करने का फैसला किया—पर्यावरणविदों, माइनिंग एक्सपर्ट्स और वैज्ञानिकों से नाम 4 सप्ताह में मांगे। कमिटी कोर्ट की निगरानी में काम करेगी। कोर्ट ने चेतावनी दी: “अवैध खनन से अपरिवर्तनीय क्षति हो रही है—इसे सख्ती से रोका जाएगा।”
  • क्लाइमेट चेंज: बढ़ते तापमान, एक्सट्रीम वेदर और डेजर्टिफिकेशन से अरावली की क्षमता कमजोर हो रही है।
  • अनियोजित शहरीकरण: NCR में तेज विकास से एन्क्रोचमेंट, प्रदूषण और ग्रीन स्पेस लॉस।
  • अवैध गतिविधियाँ: छिटपुट खनन जारी—राजनीतिक संरक्षण के आरोप।
  • परिभाषा विवाद: 100 मीटर क्राइटेरिया पर बहस—कम ऊंचाई वाले क्षेत्र बाहर हो सकते हैं, जिससे माइनिंग/निर्माण बढ़ सकता है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: तेंदुओं का शहरों में आना बढ़ रहा है।

निष्कर्ष
अरावली बचाना सिर्फ पहाड़ियों की नहीं—उत्तर भारत के जल, हवा, जैव विविधता और लाखों लोगों के भविष्य की लड़ाई है। ग्रीन वॉल, कम्युनिटी एक्शन और कोर्ट की सख्ती से उम्मीद है, लेकिन सतत प्रयास और जन जागरूकता जरूरी।

21 जनवरी 2026 तक, अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट का सबसे हालिया और निर्णायक हस्तक्षेप हुआ है। CJI सूर्या कांत की बेंच (जस्टिस जोयमलया बागची और जस्टिस विपुल पांचोली के साथ) ने आज की सुनवाई में स्पष्ट किया कि अरावली की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण प्राथमिकता है। प्रमुख बिंदु:

  • 100 मीटर ऊंचाई वाली परिभाषा पर स्टे जारी: नवंबर 2025 के फैसले (जिसमें अरावली को 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों के रूप में परिभाषित किया गया था) को अब भी अभय में रखा गया है। कोर्ट ने स्टे बढ़ाया और स्टेटस क्वो बनाए रखने का आदेश दिया—कोई नई परिभाषा लागू नहीं होगी जब तक एक्सपर्ट कमिटी रिपोर्ट नहीं देती।
  • अवैध खनन पर सख्त चेतावनी: कोर्ट ने कहा कि अवैध खनन से “अप्रत्यावर्तनीय क्षति” (irreversible damage) हो रही है। राजस्थान सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई अनधिकृत खनन नहीं होगा—कोर्ट ने इसे रिकॉर्ड पर लिया।
  • एक्सपर्ट कमिटी गठन: कोर्ट ने हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी बनाने का फैसला किया, जिसमें पर्यावरणविदों, वन विशेषज्ञों और माइनिंग एक्सपर्ट्स शामिल होंगे। ASG ऐश्वर्या भाटी और अमिकस क्यूरी के. परमेश्वर से 4 सप्ताह में नाम मांगे गए। कमिटी कोर्ट की निगरानी में काम करेगी और खनन, बहाली तथा संबंधित मुद्दों की विस्तृत जांच करेगी।
  • PLPA और वन भूमि पर स्थिर रुख: PLPA (1900) के तहत अधिसूचित भूमि को “वन भूमि” माना जाएगा। बिना केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के कोई खनन, निर्माण या गैर-वन गतिविधि नहीं हो सकती। सोनिया विहार, फरीदाबाद, गुरुग्राम और अन्य क्षेत्रों में अवैध कब्जे हटाने के आदेश बरकरार हैं।

यह फैसला MC Mehta मामले और अन्य संबंधित याचिकाओं में पिछले दशकों के फैसलों (2002, 2004, 2018, 2022) को मजबूत करता है—अरावली में विकास से पहले पर्यावरण संरक्षण अनिवार्य है।

  • एक तरफ स्थानीय मजदूर, छोटे खननकर्ता और रियल एस्टेट से जुड़े लोग—जिनकी आजीविका (mining, construction jobs) प्रभावित हुई है। वे विकास, रोजगार और निवेश बचाने की मांग करते हैं।
  • दूसरी तरफ दिल्ली-NCR के नागरिक, पर्यावरणविद और युवा—जो स्वच्छ हवा, भूजल रिचार्ज, प्रदूषण नियंत्रण और आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अरावली और कमजोर हुई, तो थार का विस्तार तेज होगा, दिल्ली रेगिस्तान जैसी स्थिति में पहुंच सकती है, और जल-हवा संकट गहरा जाएगा।

बहाली की उम्मीद: Aravalli Green Wall Project
सकारात्मक पक्ष—सरकार सक्रिय है। Aravalli Green Wall Project के तहत:

  • 6.45 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि चिह्नित की गई।
  • 2.7 मिलियन हेक्टेयर पर ग्रीनिंग शुरू।
  • 2025 में 36,025 हेक्टेयर बहाल और 3.93 करोड़ पौधे लगाए गए।
  • 2030 तक लक्ष्य: बड़े पैमाने पर मूल प्रजातियों का रोपण, जल संरक्षण और कम्युनिटी भागीदारी।

प्रश्न 1: अरावली पर्वतमाला का मुख्य विवाद क्या है?

उत्तर: मुख्य विवाद अरावली की ज़मीन के मालिकाना हक और उसके उपयोग को लेकर है। हरियाणा सरकार और बिल्डर्स का तर्क रहा है कि PLPA कानून के तहत आने वाली ज़मीन ‘जंगल’ नहीं है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अरावली की यह ज़मीन ‘वन भूमि’ (Forest Land) है और यहाँ किसी भी तरह का निर्माण या खनन गैर-कानूनी है।

प्रश्न 2: PLPA 1900 कानून क्या है और यह अरावली से कैसे जुड़ा है?

उत्तर: पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट (PLPA), 1900 एक ब्रिटिश कालीन कानून है जो मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए बनाया गया था। इसके तहत अरावली की हज़ारों एकड़ ज़मीन को ‘संरक्षित’ घोषित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस एक्ट के दायरे में आने वाली ज़मीन को पूर्णतः ‘वन’ माना जाएगा, जिससे वहां व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लग गई है।

प्रश्न 3: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली माइनिंग (खनन) पर क्या फैसला सुनाया है?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है। कोर्ट ने राजस्थान और हरियाणा सरकारों को कड़े निर्देश दिए हैं कि गायब हुई पहाड़ियों को फिर से बहाल (Restore) किया जाए और किसी भी नई माइनिंग लीज को बिना फॉरेस्ट क्लीयरेंस के अनुमति न दी जाए।

प्रश्न 4: क्या अरावली में बने फार्महाउस और होटल अब तोड़े जाएंगे?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, वन भूमि (Forest Land) पर बना कोई भी व्यावसायिक ढांचा, चाहे वह आलीशान फार्महाउस हो या होटल, अवैध माना जाएगा। कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन को ऐसी संपत्तियों को चिन्हित करने और उन्हें ध्वस्त करने का आदेश दिया है, जैसा कि खोरी गाँव के मामले में देखा गया था।

प्रश्न 5: नया वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023 (FCA) अरावली को कैसे प्रभावित करेगा?

उत्तर: नया कानून ‘जंगल’ की परिभाषा को सीमित करने की कोशिश करता है, जिससे अरावली के कुछ हिस्सों पर खतरा मंडरा रहा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया है कि ‘जंगल’ की पुरानी और व्यापक परिभाषा ही लागू रहेगी, जिससे अरावली को फिलहाल कानूनी सुरक्षा कवच मिला हुआ है।

प्रश्न 6: अरावली का विनाश दिल्ली-NCR के लिए खतरा क्यों है?

उत्तर: अरावली दिल्ली-NCR के लिए ‘ग्रीन लंग्स’ का काम करती है। यह थार रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है और क्षेत्र के ग्राउंडवाटर को रिचार्ज करती है। इसके विनाश से उत्तर भारत में धूल भरी आंधियां बढ़ेंगी, जलस्तर गिरेगा और प्रदूषण का स्तर जानलेवा हो जाएगा।

इस लेख में दी गई जानकारी पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, माननीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के आदेशों, आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों और प्रतिष्ठित मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य केवल पाठकों को अरावली संरक्षण और इससे जुड़े कानूनी पहलुओं के प्रति शिक्षित और जागरूक करना है।

यहाँ प्रस्तुत विचार और तथ्य किसी भी राजनीतिक दल, संस्था या व्यक्ति विशेष की छवि को प्रभावित करने के उद्देश्य से नहीं लिखे गए हैं। हमने विकास (Development) और पर्यावरण संरक्षण (Environmental Conservation) के दोनों पक्षों को निष्पक्षता से रखने का प्रयास किया है। चूँकि अरावली से जुड़े कई मामले अभी भी विभिन्न न्यायालयों में ‘विचाराधीन’ (Sub-judice) हैं, इसलिए पाठक किसी भी कानूनी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले आधिकारिक अदालती दस्तावेजों का संदर्भ अवश्य लें। लेखक या वेबसाइट किसी भी कानूनी गलतफहमी के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।


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